चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई

चौपाई ३, दोहा २१३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई॥ भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए॥ ३ ॥

अर्थ

[और कहा कि] भरत की पहुनाई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने “हे नाथ! बहुत अच्छा” कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने काम को चल दिये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २१३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।

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भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार