कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा

चौपाई १, दोहा २१६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥ रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥ १ ॥

अर्थ

[प्रातःकाल] भरतजी ने तीर्थराज में स्नान किया और समाज सहित मुनि को सिर नवाकर और ऋषि की आज्ञा तथा आशीर्वाद को सिर चढ़ाकर दण्डवत् करके बहुत विनती की।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।

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भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार