बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस

दोहा २१४ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह॥ २१४ ॥

अर्थ

और फिर कुटुम्ब सहित भरतजी को दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजी ने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियों को आराम मिले, इसलिये उनके मन की बात जानकर मुनि ने पहले उन लोगों को स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजी को स्थान देने के लिये आज्ञा दी थी।] मुनिश्रेष्ठ ने तपोबल से ब्रह्मा को भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का दोहा २१४ है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।

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भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार