श्रीरामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग

सीताजी के वियोग में श्रीराम वन-वन खोजते हुए व्याकुल हो उठते हैं। उन्हें जटायु मिलता है, जो अंतिम क्षणों में रावण का समाचार देकर प्रभु की कृपा से उत्तम गति पाता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १४ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥ जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥ १ ॥

अर्थ:

[इधर] श्रीरघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को आते देखकर बाह्य रूप में बहुत चिन्ता की [और कहा-] हे भाई! तुमने जानकी को अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ चले आये।

चौपाई

निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥ २ ॥

अर्थ:

राक्षसों के झुंड वन में फिरते रहते हैं। मेरे मन में ऐसा आता है कि सीता आश्रम में नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजी ने श्रीरामजी के चरणकमलों को पकड़कर हाथ जोड़कर कहा-हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है।

चौपाई

अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥ आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥ ३ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामजी वहाँ गये जहाँ गोदावरी के तट पर उनका आश्रम था। आश्रम को जानकीजी से रहित देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्य की भाँति व्याकुल और दीन (दुखी) हो गये।

चौपाई

हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥ लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती॥ ४ ॥

अर्थ:

हा गुणों की खान जानकी सीते! रूप, शील, व्रत, नियमों में पवित्र! लक्ष्मणजी ने बहुत प्रकार से समझाया। तब श्रीरामजी लताओं और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चले।

चौपाई

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥ खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥ ५ ॥

अर्थ:

हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की श्रेणियों! तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? खंजन, सुक, कपोत, मृग, मीन, मधुपों का समूह, प्रवीण कोयल,

चौपाई

कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥ ६ ॥

अर्थ:

कुन्द कली, दाड़िम, दामिनी, कमल, शरद् का चन्द्रमा और नागिनी, वरुण का पाश, मनोज का धनुष, हंस, गज और केहरी--ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं।

चौपाई

श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥ ७ ॥

अर्थ:

नारियल, सोना और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मन में जरा भी संक और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना आज ये सब ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों।

चौपाई

किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहु महा बिरही अति कामी॥ ८ ॥

अर्थ:

तुमसे यह अनख (स्पर्धा) कैसे सही जाती है? हे प्रिये! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती? इस प्रकार [ अनन्त ब्रह्माण्डों के अथवा महामहिमामयी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजी के ] स्वामी श्रीरामजी सीताजी को खोजते हुए विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो।

चौपाई

पूरनकाम राम सुख रासी। मनुजचरित कर अज अबिनासी॥ आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥ ९ ॥

अर्थ:

पूर्णकाम, आनन्द की राशि, अजन्मा और अविनाशी श्रीरामजी मनुष्यों-से चरित्र कर रहे हैं। आगे [जाने पर] उन्होंने गीधपति जटायु को पड़ा देखा। वह श्रीरामजी के चरणों का स्मरण कर रहा था, जिनमें [ध्वजा-कुलिश आदिकी] रेखाएँ (चिह्न) हैं।

दोहा

कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर। निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर॥ ३० ॥

अर्थ:

कृपासिंधु रघुबीर ने अपने करकमल से उसके सिर का स्पर्श किया (उसके सिर पर कर-कमल फेर दिया)। शोभाधाम श्रीरामजी का [परम सुन्दर] मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही।

दोहा 31 के अंतर्गत
चौपाई

तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही॥ १ ॥

अर्थ:

तब धीरज धरकर गीधने यह वचन कहा-हे भव (जन्म-मृत्यु) के भय का नाश करनेवाले श्रीरामजी! सुनिये। हे नाथ! रावण ने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्ट ने जानकीजी को हर लिया है।

चौपाई

लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं। बिलपति अति कुररी की नाईं॥ दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥ २ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया है। सीताजी कुररी (कुर्ज) की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। हे प्रभो! मैंने आपके दर्शनों के लिये ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान! अब ये चलना ही चाहते हैं।

चौपाई

राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता॥ जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा--हे तात! शरीर को बनाये रखिये। तब उसने मुसकराते हुए मुँह से यह बात कही-मरते समय जिनका नाम मुख में आ जाने से अधम (महान्‌ पापी) भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं--।

चौपाई

सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥ जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

वही (आप) मेरे नेत्रों के विषय होकर सामने खड़े हैं। हे नाथ! अब मैं किस कमी [की पूर्ति] के लिये देह को रखूँ? नेत्रों में जल भरकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे--हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मों से [दुर्लभ] गति पायी है।

चौपाई

परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥ तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥ ५ ॥

अर्थ:

जिनके मन में दूसरे का हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत् में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाम में जाइये। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)।

दोहा

सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ। जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ ३१ ॥

अर्थ:

हे तात! सीताहरण की बात आप जाकर पिताजी से न कहियेगा। यदि मैं राम हूँ तो दशमुख रावण कुटुम्ब सहित वहाँ आकर स्वयं ही कहेगा।

दोहा 32 के अंतर्गत
चौपाई

गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥ स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥ १ ॥

अर्थ:

जटायु ने गीध की देह त्यागकर हरि का रूप धारण किया और बहुत-से अनुपम (दिव्य) आभूषण और [दिव्य] पीताम्बर पहन लिये। श्याम शरीर है, विशाल चार भुजाएँ हैं और नेत्रों में [प्रेम तथा आनन्द के आँसुओं का] जल भरकर वह स्तुति कर रहा है--।

छन्द

जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥ पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥ १ ॥

अर्थ:

हे रामजी! आपकी जय हो। आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सत्य ही गुणों के (माया के) प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावण की प्रचण्ड भुजाओं को खण्ड-खण्ड करने के लिये प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वी को सुशोभित करनेवाले, जलयुक्त मेघ के समान श्याम शरीरवाले, कमल के समान मुख और [लाल] कमल के समान विशाल नेत्रोंवाले, विशाल भुजाओंवाले और भव-भय से छुड़ानेवाले कृपालु श्रीरामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।

छन्द

बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥ जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥ २ ॥

अर्थ:

आप अपरिमित बलवाले हैं, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त (निराकार), एक, अगोचर (अलक्ष्य), गोविन्द (वेदवाक्यों द्वारा जाननेयोग्य), इन्द्रियों से अतीत, [जन्म-मरण, सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि ] इन्द्रियों को हरनेवाले, विज्ञान की घनमूर्ति और पृथ्वी के आधार हैं तथा जो संत राम-मन्त्र को जपते हैं, उन अनन्त सेवकों के मन को आनन्द देनेवाले हैं। उन निष्कामजनों के प्रिय तथा काम आदि दुष्टों के दल का दलन करनेवाले श्रीरामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।

छन्द

जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥ सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनको श्रुतियाँ निरञ्जन (मायासे परे), ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं। मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं। वे ही करुणाकन्द, शोभा के समूह [स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़-चेतन समस्त जगत् को मोहित कर रहे हैं। मेरे हृदय-कमल के भ्रमररूप उनके अंग-अंग में बहुत-से कामदेवों की छवि शोभा पा रही है।

छन्द

जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥ सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥ ४ ॥

अर्थ:

जो अगम और सुगम हैं, निर्मलस्वभाव हैं, विषम और सम हैं और सदा शीतल (शान्त) हैं। मन और इन्द्रियों को सदा वश में करते हुए योगी बहुत साधन करने पर जिन्हें देख पाते हैं, वे तीनों लोकों के स्वामी, रमानिवास श्रीरामजी निरन्तर अपने दासों के वश में रहते हैं, वे ही मेरे हृदय में निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमन को मिटानेवाली है।

दोहा

अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥ ३२ ॥

अर्थ:

अखण्ड भक्ति का वर माँगकर गृध्रराज जटायु श्रीहरि के परमधाम को चला गया। श्रीरामचन्द्रजी ने उसकी [दाहकर्म आदि सारी] क्रियाएँ यथायोग्य अपने हाथों से कीं।