किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं

चौपाई ८, दोहा ३० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहु महा बिरही अति कामी॥ ८ ॥

अर्थ

तुमसे यह अनख (स्पर्धा) कैसे सही जाती है? हे प्रिये! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती? इस प्रकार [ अनन्त ब्रह्माण्डों के अथवा महामहिमामयी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजी के ] स्वामी श्रीरामजी सीताजी को खोजते हुए विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।

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राम का विलाप और जटायु प्रसंग