निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं

चौपाई २, दोहा ३० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥ २ ॥

अर्थ

राक्षसों के झुंड वन में फिरते रहते हैं। मेरे मन में ऐसा आता है कि सीता आश्रम में नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजी ने श्रीरामजी के चरणकमलों को पकड़कर हाथ जोड़कर कहा-हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।

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राम का विलाप और जटायु प्रसंग