जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम
छन्द ४, दोहा ३२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥ सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥ ४ ॥
अर्थ
जो अगम और सुगम हैं, निर्मलस्वभाव हैं, विषम और सम हैं और सदा शीतल (शान्त) हैं। मन और इन्द्रियों को सदा वश में करते हुए योगी बहुत साधन करने पर जिन्हें देख पाते हैं, वे तीनों लोकों के स्वामी, रमानिवास श्रीरामजी निरन्तर अपने दासों के वश में रहते हैं, वे ही मेरे हृदय में निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमन को मिटानेवाली है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का छन्द ४, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम का विलाप और जटायु प्रसंग