जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज
छन्द ३, दोहा ३२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥ सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥ ३ ॥
अर्थ
जिनको श्रुतियाँ निरञ्जन (मायासे परे), ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं। मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं। वे ही करुणाकन्द, शोभा के समूह [स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़-चेतन समस्त जगत् को मोहित कर रहे हैं। मेरे हृदय-कमल के भ्रमररूप उनके अंग-अंग में बहुत-से कामदेवों की छवि शोभा पा रही है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का छन्द ३, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।
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राम का विलाप और जटायु प्रसंग