सो मम लोचन गोचर आगें
सो मम लोचन गोचर आगें
चौपाई ४, दोहा ३१ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥ जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई॥ ४ ॥
अर्थ
वही (आप) मेरे नेत्रों के विषय होकर सामने खड़े हैं। हे नाथ! अब मैं किस कमी [की पूर्ति] के लिये देह को रखूँ? नेत्रों में जल भरकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे--हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मों से [दुर्लभ] गति पायी है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम का विलाप और जटायु प्रसंग