जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन
छन्द १, दोहा ३२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥ पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥ १ ॥
अर्थ
हे रामजी! आपकी जय हो। आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सत्य ही गुणों के (माया के) प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावण की प्रचण्ड भुजाओं को खण्ड-खण्ड करने के लिये प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वी को सुशोभित करनेवाले, जलयुक्त मेघ के समान श्याम शरीरवाले, कमल के समान मुख और [लाल] कमल के समान विशाल नेत्रोंवाले, विशाल भुजाओंवाले और भव-भय से छुड़ानेवाले कृपालु श्रीरामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का छन्द १, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।