श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं
चौपाई ७, दोहा ३० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥ ७ ॥
अर्थ
नारियल, सोना और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मन में जरा भी संक और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना आज ये सब ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।
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राम का विलाप और जटायु प्रसंग