बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं

छन्द २, दोहा ३२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

छन्द पाठ

बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥ जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥ २ ॥

अर्थ

आप अपरिमित बलवाले हैं, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त (निराकार), एक, अगोचर (अलक्ष्य), गोविन्द (वेदवाक्यों द्वारा जाननेयोग्य), इन्द्रियों से अतीत, [जन्म-मरण, सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि ] इन्द्रियों को हरनेवाले, विज्ञान की घनमूर्ति और पृथ्वी के आधार हैं तथा जो संत राम-मन्त्र को जपते हैं, उन अनन्त सेवकों के मन को आनन्द देनेवाले हैं। उन निष्कामजनों के प्रिय तथा काम आदि दुष्टों के दल का दलन करनेवाले श्रीरामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।

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राम का विलाप और जटायु प्रसंग