परहित बस जिन्ह के मन माहीं
परहित बस जिन्ह के मन माहीं
चौपाई ५, दोहा ३१ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥ तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥ ५ ॥
अर्थ
जिनके मन में दूसरे का हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत् में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाम में जाइये। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राम का विलाप और जटायु प्रसंग” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता-वियोग में राम के विलाप और जटायु को मुक्ति मिलने का वर्णन है।
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राम का विलाप और जटायु प्रसंग