जटायु-रावण युद्ध

जटायु सीताजी की रक्षा के लिए रावण को निर्भीक होकर ललकारते हैं। धर्म की रक्षा में लड़े इस युद्ध में वे गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १३ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥ अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥ ४ ॥

अर्थ:

गीधराज जटायु ने सीताजी की दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी हैं। [उसने देखा कि] नीच राक्षस इनको [बुरी तरह] लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के वश में हो गयी हो।

चौपाई

सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥ धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें॥ ५ ॥

अर्थ:

[वह बोला--] हे सीते पुत्री! भय मत कर। मैं इस राक्षस का नाश करूँगा। [यह कहकर] वह पक्षी क्रोध में भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वत की ओर वज्र छूटता हो।

चौपाई

रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही॥ आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना॥ ६ ॥

अर्थ:

[उसने ललकारकर कहा--] रे रे दुष्ट! खड़ा क्यों नहीं होता? निडर होकर चल दिया! मुझे तूने नहीं जाना? उसको यमराज के समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मन में अनुमान करने लगा--।

चौपाई

की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई॥ जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा॥ ७ ॥

अर्थ:

यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। पर वह (गरुड़) तो अपने स्वामी विष्णु सहित मेरे बल को जानता है! [कुछ पास आने पर] रावण ने उसे पहचान लिया [और बोला--] यह तो बूढ़ा जटायु है! यह मेरे हाथरूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा।

चौपाई

सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा॥ तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू॥ ८ ॥

अर्थ:

यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर बड़े वेग से दौड़ा और बोला--रावण! मेरी सिखावन सुन। जानकीजी को छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहीं तो हे बहुत भुजाओंवाले! ऐसा होगा कि-।

चौपाई

राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा॥ उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा॥ ९ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के क्रोधरूपी अत्यन्त भयानक अग्नि में तेरा सारा वंश पतिंगा [होकर भस्म] हो जायगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा।

चौपाई

धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा॥ चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही॥ १० ॥

अर्थ:

उसने [रावण के] बाल पकड़कर उसे रथ के नीचे उतार लिया, रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा। गीध सीताजी को एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंचों से मार-मारकर रावण के शरीर को विदीर्ण कर डाला। इससे उसे एक दण्ड के लिए मूर्छा हो गयी।

चौपाई

तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना॥ काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी॥ ११ ॥

अर्थ:

तब खिसियाये हुए रावण ने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायु के पंख काट डाले। पक्षी (जटायु) श्रीरामजी की अद्भुत लीलाका स्मरण करके पृथ्वी पर गिर पड़ा।

चौपाई

सीतहि जान चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी॥ करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता॥ १२ ॥

अर्थ:

सीताजी को फिर रथ पर चढ़ाकर रावण बड़ी उतावली के साथ चला, उसे भय कम न था। सीताजी आकाश में विलाप करती हुई जा रही हैं। मानो व्याध के वश में पड़ी हुई कोई भयभीत हिरनी हो!

चौपाई

गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी॥ एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ॥ १३ ॥

अर्थ:

पर्वत पर बैठे हुए बंदरों को देखकर सीताजी ने हरि नाम लेकर वस्त्र डाल दिया। इस प्रकार वह सीताजी को ले गया और उन्हें अशोकवन में जा रखा।

दोहा

हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ। तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ॥ २९ (क) ॥

अर्थ:

सीताजी को बहुत प्रकार से भय और प्रीति दिखलाकर जब वह दुष्ट हार गया, तब उन्हें जतन कराके अशोक-वृक्ष के नीचे रख दिया।

दोहा

जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥ २९ (ख) ॥

अर्थ:

जिस प्रकार कपट मृग के साथ श्रीरामजी दौड़ चले थे, उसी छवि को हृदय में रखकर वे हरिनाम रटती रहती हैं।