ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं

चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥ ४ ॥

अर्थ

ज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सब में समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात! उसी को परम बैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।

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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद