मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा
चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥ कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥ ४ ॥
अर्थ
हे देव! मुझे समझाकर वही कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिये; और उस भक्ति को कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।
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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद