संत चरन पंकज अति प्रेमा
संत चरन पंकज अति प्रेमा
चौपाई ५, दोहा १६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥ गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥ ५ ॥
अर्थ
जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो;।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद