रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई

चौपाई ४, दोहा १७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥ ४ ॥

अर्थ

वह सुन्दर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली--न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री ! विधाता ने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।

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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद