माया ईस न आपु कहुँ जान
माया ईस न आपु कहुँ जान
दोहा १५ · अरण्यकाण्ड
दोहा पाठ
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥ १५ ॥
अर्थ
जो मायाको, ईश को और अपने आपको नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। जो [कर्मानुसार] बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और मायाका प्रेरक है वह शिव है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का दोहा १५ है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।
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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद