सेवक सुख चह मान भिखारी
सेवक सुख चह मान भिखारी
चौपाई ८, दोहा १७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥ लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥ ८ ॥
अर्थ
सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदि का व्यसन हो) धन और व्यभिचारी शुभ गति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल--अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं (अर्थात् असम्भव बात को सम्भव करना चाहते हैं)।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।
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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद