मम अनुरूप पुरुष जग माहीं

चौपाई ५, दोहा १७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥ तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥ ५ ॥

अर्थ

मेरे योग्य पुरुष (वर) जगत् भर में नहीं है, मैंने तीनों लोकों को खोज देखा। इसीसे मैं अब तक कुमारी (अविवाहित) रही। अब तुम को देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा) है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।

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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद