सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा

चौपाई ७, दोहा १७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥ ७ ॥

अर्थ

हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ। मैं पराधीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता (सुख) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पंचवटी निवास में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति के उपदेश का वर्णन है।

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पंचवटी निवास और राम-लक्ष्मण संवाद