दूत द्वारा रावण को समझाना और लक्ष्मणजी का पत्र देना

शुक रावण को श्रीरामजी की सेना का बल और प्रभु की महिमा बताकर सावधान करता है। फिर वह लक्ष्मणजी का पत्र प्रस्तुत करता है, जिसमें अंतिम चेतावनी निहित है।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १८ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥ मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥ १ ॥

अर्थ:

[दूत ने कहा--] हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए (मेरी बात पर विश्वास कीजिए)। जब आपका छोटा भाई श्रीरामजी से जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्रीरामजी ने उसको राजतिलक कर दिया।

चौपाई

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥ श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥ २ ॥

अर्थ:

हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुनकर वानरों ने हमें बाँधकर बहुत कष्ट दिये, यहाँ तक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे। श्रीरामजी की शपथ दिलाने पर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा।

चौपाई

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥ नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपने श्रीरामजी की सेना पूछी; सो वह तो सौ करोड़ मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेकों रंगों के भालु और वानरों की सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले और भयानक हैं।

चौपाई

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥ अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥ ४ ॥

अर्थ:

जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र को मारा, उसका बल तो सब वानरों में थोड़ा है। असंख्य नामों वाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियों का बल है और वे बड़े ही विशाल हैं।

दोहा

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ ५४ ॥

अर्थ:

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटासि, दधिमुख, केहरि, निशठ, शठ और जामवंत--ये सभी बल की राशि हैं।

दोहा 55 के अंतर्गत
चौपाई

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥ राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥ १ ॥

अर्थ:

ये सब वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके जैसे [एक-दो नहीं] करोड़ों हैं, उन बहुत-सों को गिन ही कौन सकता है? श्रीरामजी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकों को तृण के समान [तुच्छ] समझते हैं।

चौपाई

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥ नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके।

चौपाई

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥ सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥ ३ ॥

अर्थ:

सब-के-सब अत्यन्त क्रोध से हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपों सहित समुद्र को सोख लेंगे। नहीं तो, बड़े-बड़े पर्वतों से उसे भरकर पाट देंगे।

चौपाई

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥ गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥ ४ ॥

अर्थ:

और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हों।

दोहा

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥ ५५ ॥

अर्थ:

सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिर पर प्रभु श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं।

दोहा 56 के अंतर्गत
चौपाई

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥ सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धि की अधिकताको लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, परन्तु नीतिनिपुण श्रीरामजी ने [नीति की रक्षाके लिये] आपके भाई से उपाय पूछा।

चौपाई

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥ सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ २ ॥

अर्थ:

उनके (आपके भाई के) वचन सुनकर वे (श्रीरामजी) समुद्र से राह माँग रहे हैं, उनके मन में कृपा भरी है [इसलिये वे उसे सोखते नहीं]। दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [और बोला--] जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है।

चौपाई

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥ मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥ ३ ॥

अर्थ:

स्वाभाविक ही डरपोक विभीषण के वचन को प्रमाण करके उन्होंने समुद्र से मचलना (बालहठ) ठाना है। अरे मूर्ख! झूठी बड़ाई क्या करता है! बस, मैंने शत्रु (राम) के बल और बुद्धि की थाह पा ली।

चौपाई

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥ सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥ ४ ॥

अर्थ:

जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत में विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ! दुष्ट रावण के वचन सुनकर दूत को क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली।

चौपाई

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥ बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥ ५ ॥

अर्थ:

[और कहा--] श्रीरामजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिये। रावण ने हँसकर उसे बायें हाथ से लिया और मन्त्री को बुलवाकर वह मूर्ख उसे बँचाने लगा।

दोहा

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ ५६ (क) ॥

अर्थ:

[पत्रिका में लिखा था--] अरे मूर्ख! केवल बातों से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट न कर! श्रीरामजी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण जाने पर भी नहीं बचेगा।

दोहा

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥ ५६ (ख) ॥

अर्थ:

या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भाँति प्रभु के चरण-कमलों का भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट, श्रीरामजी के बाणरूपी अग्नि में परिवारसहित पतिंगा हो जा (दोनों में से जो अच्छा लगे सो कर)।

दोहा 57 के अंतर्गत
चौपाई

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥ भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥ १ ॥

अर्थ:

पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परन्तु मुख से (ऊपर से) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा--जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग हाँकता है)।

चौपाई

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥ सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥ २ ॥

अर्थ:

शुक (दूत) ने कहा--हे नाथ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर [इस पत्र में लिखी] सब बातों को सत्य समझिये। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये। हे नाथ! श्रीरामजी से बैर त्याग दीजिये।

चौपाई

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥ मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यन्त ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदय में नहीं रखेंगे।

चौपाई

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥ जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥ ४ ॥

अर्थ:

जानकीजी श्रीरघुनाथजी को दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिये। जब उस (दूत) ने जानकीजी को देने के लिये कहा, तब दुष्ट रावण ने उसको लात मारी।

चौपाई

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥ ५ ॥

अर्थ:

वह भी [विभीषण की भाँति] चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजी की कृपा से अपनी गति (मुनि का स्वरूप) पायी।

चौपाई

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥ बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥ ६ ॥

अर्थ:

(शिवजी कहते हैं--) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजी के चरणों की वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया।