तासु बचन सुनि सागर पाहीं
तासु बचन सुनि सागर पाहीं
चौपाई २, दोहा ५६ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥ सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ २ ॥
अर्थ
उनके (आपके भाई के) वचन सुनकर वे (श्रीरामजी) समुद्र से राह माँग रहे हैं, उनके मन में कृपा भरी है [इसलिये वे उसे सोखते नहीं]। दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [और बोला--] जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “शुक की रावण को चेतावनी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शुक द्वारा रावण को राम की सेना की शक्ति बताना और लक्ष्मणजी की अंतिम चेतावनी का पत्र देना का वर्णन है।
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शुक की रावण को चेतावनी