रिषि अगस्ति कीं साप भवानी

चौपाई ६, दोहा ५७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥ बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥ ६ ॥

अर्थ

(शिवजी कहते हैं--) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजी के चरणों की वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “शुक की रावण को चेतावनी” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शुक द्वारा रावण को राम की सेना की शक्ति बताना और लक्ष्मणजी की अंतिम चेतावनी का पत्र देना का वर्णन है।

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शुक की रावण को चेतावनी