नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ

चौपाई ५, दोहा ५७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥ ५ ॥

अर्थ

वह भी [विभीषण की भाँति] चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजी की कृपा से अपनी गति (मुनि का स्वरूप) पायी।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “शुक की रावण को चेतावनी” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शुक द्वारा रावण को राम की सेना की शक्ति बताना और लक्ष्मणजी की अंतिम चेतावनी का पत्र देना का वर्णन है।

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शुक की रावण को चेतावनी