अस मैं सुना श्रवन दसकंधर

चौपाई २, दोहा ५५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥ नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥ २ ॥

अर्थ

हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “शुक की रावण को चेतावनी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शुक द्वारा रावण को राम की सेना की शक्ति बताना और लक्ष्मणजी की अंतिम चेतावनी का पत्र देना का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
शुक की रावण को चेतावनी