लंका वर्णन, लंकिनी पर प्रहार, लंका में प्रवेश
हनुमानजी रात्रि में स्वर्णमयी लंका का अवलोकन करते हैं। लंकिनी को परास्त करके वे सूक्ष्म रूप धारण कर नगर में प्रवेश करते हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ३ / २०
प्रकरण पाठ
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं-- ] हे उमा! इसमें वानर हनुमानजी की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। [वह] अत्यन्त दुर्गविशेषी [किला] है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ १ ॥
अर्थ:
विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, हट्ट, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह तथा पैदल और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है! अनेक रूपों वाले राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना का वर्णन नहीं बनता।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ २ ॥
अर्थ:
वन, बाग, उपवन, बाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याएँ रूप से मुनियों के मन को मोहित करती हैं। कहीं मल्ल-देह विशाल पर्वत के समान अत्यन्त बलवान गरज रहे हैं। अनेकों अखाड़ों में वे बहुत प्रकार से भिड़ते हैं और एक-एक को ललकारते हैं।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ ३ ॥
अर्थ:
भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा यत्न करके नगर की चारों दिशाओं में रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के बाणरूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पावेंगे।
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १ ॥
अर्थ:
हनुमानजी मच्छर के समान छोटा-सा रूप धारण कर नरहरी का स्मरण करके लंका को चले। [लंकाके द्वार पर] लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली-- मुझे निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥ जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३ ॥
अर्थ:
वह लंकिनी फिर अपने को सँभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली--] रावण को जब ब्रह्माजी ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी कि--।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ १ ॥
अर्थ:
अयोध्यापुरी के राजा श्रीराम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ २ ॥
अर्थ:
और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रज के समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजी ने कृपा करके एक बार देख लिया। तब हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥ २ ॥
अर्थ:
उन्होंने राम-राम का स्मरण किया। हनुमानजी ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय में हर्षित हुए। [हनुमानजी ने विचार किया कि] इनसे हठ करके मैं परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ ही होता है]।