लंका वर्णन, लंकिनी पर प्रहार, लंका में प्रवेश

हनुमानजी रात्रि में स्वर्णमयी लंका का अवलोकन करते हैं। लंकिनी को परास्त करके वे सूक्ष्म रूप धारण कर नगर में प्रवेश करते हैं।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ३ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥ सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ ४ ॥

अर्थ:

अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूल से सुशोभित हैं। पक्षियों और पशुओं के समूह को देखकर वे मन में [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उस पर दौड़कर चढ़े।

चौपाई

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं-- ] हे उमा! इसमें वानर हनुमानजी की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। [वह] अत्यन्त दुर्गविशेषी [किला] है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥ ६ ॥

अर्थ:

वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोने के परकोटे का परम प्रकाश हो रहा है।

छन्द

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ १ ॥

अर्थ:

विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, हट्ट, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह तथा पैदल और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है! अनेक रूपों वाले राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना का वर्णन नहीं बनता।

छन्द

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ २ ॥

अर्थ:

वन, बाग, उपवन, बाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याएँ रूप से मुनियों के मन को मोहित करती हैं। कहीं मल्ल-देह विशाल पर्वत के समान अत्यन्त बलवान गरज रहे हैं। अनेकों अखाड़ों में वे बहुत प्रकार से भिड़ते हैं और एक-एक को ललकारते हैं।

छन्द

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ ३ ॥

अर्थ:

भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा यत्न करके नगर की चारों दिशाओं में रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के बाणरूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पावेंगे।

दोहा

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३ ॥

अर्थ:

नगर के बहुत-से रखवालों को देखकर हनुमानजी ने मन में विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धारण करूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ।

दोहा 4 के अंतर्गत
चौपाई

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १ ॥

अर्थ:

हनुमानजी मच्छर के समान छोटा-सा रूप धारण कर नरहरी का स्मरण करके लंका को चले। [लंकाके द्वार पर] लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली-- मुझे निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?

चौपाई

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ २ ॥

अर्थ:

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमानजी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर लुढ़क पड़ी।

चौपाई

पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥ जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह लंकिनी फिर अपने को सँभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली--] रावण को जब ब्रह्माजी ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी कि--।

चौपाई

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४ ॥

अर्थ:

जब तू बंदर के मारे जाने से व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैंने श्रीरामचन्द्रजी के दूत को नेत्रों से देख लिया।

दोहा

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! स्वर्ग और अपवर्ग के सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़े पर रखे हुए] उस सुख के बराबर नहीं हैं, जो लव [क्षण]-मात्र के सत्संग से होता है।

दोहा 5 के अंतर्गत
चौपाई

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ १ ॥

अर्थ:

अयोध्यापुरी के राजा श्रीराम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।

चौपाई

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ २ ॥

अर्थ:

और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रज के समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजी ने कृपा करके एक बार देख लिया। तब हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।

चौपाई

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥ गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महल की खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावण के महल में गये। वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता।

चौपाई

सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ ४ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने उस (रावण) को शयन किये देखा; परन्तु महल में जानकीजी नहीं दिखायी दीं। फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया। वहाँ (उसमें) भगवान का एक अलग मन्दिर बना हुआ था।

दोहा

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥ ५ ॥

अर्थ:

वह गृह श्रीरामजी के आयुधों के चिह्नों से अंकित था; उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। वहाँ नवीन तुलसी के वृन्द को देखकर कपिराज हर्षित हुए।

दोहा 6 के अंतर्गत
चौपाई

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥ मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ १ ॥

अर्थ:

लंका राक्षसों के समूह का निवासस्थान है। यहाँ सज्जन का निवास कहाँ? हनुमानजी मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे।

चौपाई

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने राम-राम का स्मरण किया। हनुमानजी ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय में हर्षित हुए। [हनुमानजी ने विचार किया कि] इनसे हठ करके मैं परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ ही होता है]।