लंका दहन
हनुमानजी की पूँछ में लगाई गई अग्नि ही लंका के विनाश का कारण बनती है। वे नगर भर में घूमकर राक्षसों के अहंकार को दग्ध कर देते हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १० / २०
प्रकरण पाठ
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥ कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ ३ ॥
अर्थ:
[पूँछ के लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि] नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमानजी ने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासी लोग तमाशा देखने आये। वे हनुमानजी को पैर से मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥ उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ ४ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमानजी उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले। हनुमानजी ने उलट-पलटकर सारी लंका जला दी। फिर वे समुद्र में कूद पड़े।