हनुमान-विभीषण संवाद
लंका में हनुमानजी की भेंट विभीषण से होती है, जो भीतर से श्रीरामभक्त हैं। दोनों के संवाद में भक्ति, नीति और आने वाले कार्य की दिशा स्पष्ट होती है।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ४ / २०
प्रकरण पाठ
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥ ४ ॥
अर्थ:
क्या आप हरि-भक्तों में से कोई हैं? क्योंकि मेरे हृदय में अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनों से प्रेम करने वाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर- बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं?
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥ १ ॥
अर्थ:
[विभीषणजी ने कहा--] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतों के बीच में बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझ पर कृपा करेंगे?
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥ २ ॥
अर्थ:
मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजी की मुझ पर कृपा है; क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ३ ॥
अर्थ:
जब श्रीरघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओर से) दर्शन दिये हैं। [हनुमानजी ने कहा--] हे विभीषणजी! सुनिए, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा ही प्रेम किया करते हैं।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १ ॥
अर्थ:
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयों के पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजी के गुणसमूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की।