हनुमान-रावण संवाद

रावण की सभा में हनुमानजी निर्भीक होकर श्रीरामजी का संदेश सुनाते हैं। वे नीति, धर्म और कल्याण का मार्ग बताते हुए सीताजी को लौटा देने की सलाह देते हैं।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ९ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥ की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥ १ ॥

अर्थ:

लंकेस ने कहा-- रे वानर! तू कौन है? किस के बल पर तूने वन को उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानों से नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशंक देख रहा हूँ।

चौपाई

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥ सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥ २ ॥

अर्थ:

तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जाने का भय नहीं है? [हनुमानजी ने कहा--] हे रावण! सुन; जिनके बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के समूहों की रचना करती है।

चौपाई

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥ जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनके बल से हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्रमुख (फणों) वाले शेषजी पर्वत और वन सहित समस्त ब्रह्माण्ड को सिर पर धारण करते हैं।

चौपाई

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥ हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ ४ ॥

अर्थ:

जो देवताओं की रक्षा के लिये नाना प्रकार की देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खों को शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजी के कठोर धनुष को तोड़ डाला और उसी के साथ राजाओं के समूह का गर्व चूर्ण कर दिया।

चौपाई

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बल साली॥ ५ ॥

अर्थ:

जिन्होंने खर, दूषण, त्रिसिरा और बाली को मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान थे।

दोहा

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१ ॥

अर्थ:

जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत् को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम [चोरी से] हर लाये हो, मैं उन्हीं का दूत हूँ।

दोहा 22 के अंतर्गत
चौपाई

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥ समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १ ॥

अर्थ:

मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूँ, सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बाली से युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमानजी के [मार्मिक] वचन सुनकर रावण ने हँसकर बात टाल दी।

चौपाई

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥ सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २ ॥

अर्थ:

हे [राक्षसों के] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने फल खाये और वानर-स्वभाव के कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरों के) मालिक! देह सब को परम प्रिय है। कुमार्ग पर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे।

चौपाई

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥ मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझ को बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभु का कार्य किया चाहता हूँ।

चौपाई

बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़कर भक्तभय हारी भगवान् को भजो।

चौपाई

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥ तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥ ५ ॥

अर्थ:

जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके डर से अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि बैर न करो और मेरे कहने से जानकीजी को दे दो।

दोहा

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२ ॥

अर्थ:

खर के शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतों के रक्षक और दया के समुद्र हैं। शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरण में रख लेंगे।

दोहा 23 के अंतर्गत
चौपाई

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥ रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ १ ॥

अर्थ:

तुम श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चन्द्रमा के समान है। उस चन्द्रमा में तुम कलंक न बनो।

चौपाई

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥ २ ॥

अर्थ:

राम नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती। देखो, विचार कर, मद-मोह त्याग दो॥ वसनहीन स्त्री, हे देवताओं के शत्रु! सब गहनों से सजी हुई सुंदर नारी भी कपड़ों के बिना शोभा नहीं पाती।

चौपाई

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

रामविमुख पुरुष की सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है। जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसात का ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं।

चौपाई

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥ संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥ ४ ॥

अर्थ:

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजी के साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते।

दोहा

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३ ॥

अर्थ:

मोह ही जिसका मूल है, ऐसे बहुत पीड़ा देनेवाले तमरूप अभिमान का त्याग कर दो और रघुनायक, कृपा सिंधु भगवान् श्रीराम का भजन करो।

दोहा 24 के अंतर्गत
चौपाई

जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ १ ॥

अर्थ:

यद्यपि हनुमानजी ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से सनी हुई बहुत ही हित की वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंग्य से) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला!।

चौपाई

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥ उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ २ ॥

अर्थ:

रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमानजी ने कहा-- इससे उलटा ही होगा (अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम (बुद्धि का फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है।

चौपाई

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥ सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥ ३ ॥

अर्थ:

हनुमानजी के वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [और बोला--] ओरे! इस मूर्ख का प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियों के साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे।

चौपाई

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥ आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावण से कहा कि दूत को मारना नहीं चाहिए, यह नीति के विरुद्ध है। हे गोसाईं! कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सब ने कहा-भाई। यह सलाह उत्तम है।

चौपाई

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥ ५ ॥

अर्थ:

यह सुनते ही रावण हँसकर बोला--अच्छा, बंदर को अंग-भंग करके भेज दिया जाय।

दोहा

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४ ॥

अर्थ:

मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता पूँछ पर होती है। अतः तेल में कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछ में बाँधकर फिर आग लगा दो।

दोहा 25 के अंतर्गत
चौपाई

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥ जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥ १ ॥

अर्थ:

जब बिना पूँछ का यह बंदर वहाँ अपने स्वामी के पास जाएगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आएगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता तो देखूँ।

चौपाई

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥ जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥ २ ॥

अर्थ:

यह वचन सुनते ही हनुमानजी मन में मुसकराये [और मन-ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि देने में] सहायक हुई हैं। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछ में आग लगाने की) तैयारी करने लगे।