हनुमानजी का अशोकवाटिका में सीता को देखकर दुःखी होना और रावण का सीताजी को भय दिखलाना

अशोकवाटिका में हनुमानजी सीताजी को विरह और कष्ट में देखकर अत्यंत द्रवित होते हैं। उसी समय रावण वहाँ आकर भय और प्रलोभन से उन्हें विचलित करने का व्यर्थ प्रयास करता है।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ५ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥ कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी को देखकर हनुमानजी ने उन्हें मन ही मन प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रि के चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में श्रीरघुनाथजी के गुण-समूहों का जपती रहती हैं।

दोहा

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८ ॥

अर्थ:

श्रीजानकीजी नेत्रों को अपने चरणों में लगाये हुए हैं (नीचे की ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजी के चरणकमलों में लीन है। जानकीजी को दीन (दुखी) देखकर पवनपुत्र हनुमानजी बहुत ही दुखी हुए।

दोहा 9 के अंतर्गत
चौपाई

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥ १ ॥

अर्थ:

हनुमानजी वृक्ष के पत्तों में छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय बहुत-सी स्त्रियों को साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया।

चौपाई

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥ २ ॥

अर्थ:

उस दुष्ट ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावण ने कहा— हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियों को—।

चौपाई

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके जानकीजी तिनके की आड़ करके कहने लगीं—

चौपाई

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ४ ॥

अर्थ:

हे दशमुख! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं— तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीर के बाण की खबर नहीं है।

चौपाई

सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ ५ ॥

अर्थ:

रे पापी! तू मुझे सूने में हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती?

दोहा

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ ९ ॥

अर्थ:

अपने को जुगनू के समान और रामचन्द्रजी को सूर्य के समान सुनकर और सीताजी के कठोर वचनों को सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्से में आकर बोला—

दोहा 10 के अंतर्गत
चौपाई

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥ नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥ १ ॥

अर्थ:

सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा!

चौपाई

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥ सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥ २ ॥

अर्थ:

[सीताजी ने कहा--] हे दशग्रीव! प्रभु की भुजा जो श्याम कमल की माला के समान सुन्दर और हाथी की सूँड़ के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठ में पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है।

चौपाई

चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥ सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥ ३ ॥

अर्थ:

सीताजी कहती हैं— हे चन्द्रहास (तलवार)! श्रीरघुनाथजी के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीक्ष्ण और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दुःख के बोझ को हर ले।

चौपाई

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥ कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानव की पुत्री मन्दोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावण ने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा कि जाकर सीता को बहुत प्रकार से भय दिखलाओ।

चौपाई

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ ५ ॥

अर्थ:

यदि महीने भर में यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा।

दोहा

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १० ॥

अर्थ:

[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजी को भय दिखलाने लगे।