मंदोदरी-रावण संवाद

मंदोदरी रावण को समझाती है कि सीताजी को लौटाकर अनर्थ टाल दे। वह श्रीरामजी के सामर्थ्य का स्मरण कराकर उसे विवेक से काम लेने की सलाह देती है।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १४ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब तें जारि गयउ कपि लंका॥ निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥ १ ॥

अर्थ:

वहाँ (लङ्का में) जब से हनुमानजी लंका को जलाकर गये, तब से राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरों में सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुल की रक्षा [का कोई उपाय] नहीं है।

चौपाई

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥ दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥ २ ॥

अर्थ:

जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर कौन भलाई है (हमलोगों की बड़ी बुरी दशा होगी) ? दूतियों से नगरनिवासियों के वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी।

चौपाई

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥ कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥ ३ ॥

अर्थ:

वह एकान्त में हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरस में पगी हुई वाणी बोली-हे प्रियतम! श्रीहरि से विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहने को अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिये।

चौपाई

समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥ तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनके दूत की करनी का विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्री को बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्री को भेज दीजिये।

चौपाई

तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥ सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥ ५ ॥

अर्थ:

सीता आपके कुलरूपी कमलों के वन को दुःख देनेवाली जाड़े की रात्रि के समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीता को दिये बिना शम्भु और ब्रह्मा के किये भी आपका भला नहीं हो सकता।

दोहा

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ ३६ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेढक के समान। जब तक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तब तक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये।

दोहा 37 के अंतर्गत
चौपाई

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥ सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥ १ ॥

अर्थ:

मूर्ख और जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानों से उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा [और बोला--] स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मंगल में भी भय करती हो! तुम्हारा मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है।

चौपाई

जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥ कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥ २ ॥

अर्थ:

यदि वानरों की सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डर से काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसी की बात है।

चौपाई

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥ मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥ ३ ॥

अर्थ:

रावण ने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदय से लगा लिया और ममता बढ़ाकर वह सभामें चला गया। मन्दोदरी हृदय में चिन्ता करने लगी कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गये।

चौपाई

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥ बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥ ४ ॥

अर्थ:

ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि शत्रु की सारी सेना समुद्र के उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियों से पूछा कि उचित सलाह कहिये [अब क्या करना चाहिये ?]। तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाह की कौन-सी बात है?)।

चौपाई

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

आपने देवताओं और राक्षसों को जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं ?

दोहा

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३७ ॥

अर्थ:

मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [अप्रसन्नता के] भय या [लाभ की] आशा से [हित की बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं ); तो [क्रमशः] राज्य, शरीर और धर्म— इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है।