हनुमानजी का लंका को प्रस्थान, सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध
हनुमानजी समुद्र लाँघकर लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में वे सुरसा की परीक्षा सफलतापूर्वक पार करते हैं और छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध करके आगे बढ़ते हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण २ / २०
प्रकरण पाठ
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ २ ॥
अर्थ:
जब तक मैं सीताजी को देखकर [लौट] न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्रीरघुनाथजी को धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥ ३ ॥
अर्थ:
तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमानजी ने कहा--तो फिर मुझे खा न ले।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ २ ॥
अर्थ:
वह उस परछाईं को पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [और जल में गिर पड़ते थे]। इस प्रकार वह सदा आकाश में उड़ने वाले जीवों को खाया करती थी। उसने वही छल हनुमानजी से भी किया। हनुमानजी ने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया।