श्रीराम गुणगान की महिमा

सुन्दरकाण्ड के अंत में श्रीराम के गुणगान, स्मरण और भक्ति की महिमा कही गई है। यह पाठ श्रद्धालु के हृदय में साहस, विश्वास और मंगल भर देता है।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण २० / २०

प्रकरण पाठ

छन्द

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

अर्थ:

समुद्र अपने भवन चला गया, श्रीरघुपतिजी को यह मत भाया। यह चरित कलि-मलहर है; इसे दास तुलसी ने अपनी मति के अनुसार गाया। सुख के भवन, सन्देह के नाशक, विषाद के दमनकर्ता श्रीरघुपति के गुणगान को गाओ। सब आशा-भरोसा त्यागकर, हे सठ मन! निरन्तर गाओ और सुनो॥

दोहा

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी का गुणगान सम्पूर्ण सुमंगलों का दायक है। सादर सुनने वाले भवसागर को बिना जलयान के ही तर जायँगे।