नाथ एक संसउ बड़ मोरें

चौपाई ४, दोहा ४५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥ कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥ ४ ॥

अर्थ

हे नाथ! मेरे मन में एक बड़ा सन्देह है; वेदों का तत्त्व सब आपकी मुट्ठी में है (अर्थात्‌ आप ही वेद का तत्त्व जाननेवाले होने के कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं) पर उस सन्देह को कहते मुझे भय और लाज आती है [ भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अब तक ज्ञान न हुआ] और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ]।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य के संवाद तथा रामकथा की भूमिका का वर्णन है।

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याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य