जैसें मिटै मोर भ्रम भारी

चौपाई १, दोहा ४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥ जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥ १ ॥

अर्थ

हे नाथ! जिस प्रकार से मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिये। इस पर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजी की प्रभुता को तुम जानते हो।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य के संवाद तथा रामकथा की भूमिका का वर्णन है।

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याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य