संतत जपत संभु अबिनासी
संतत जपत संभु अबिनासी
चौपाई २, दोहा ४६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥ आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥ २ ॥
अर्थ
कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणों की राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनाम का जप करते रहते हैं। संसार में चार जाति के जीव हैं, काशी में मरने से सभी परमपद को प्राप्त करते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य के संवाद तथा रामकथा की भूमिका का वर्णन है।
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याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य