संकर उर अति छोभु सती न

सोरठा ४८ (ख) · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ। तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥ ४८ (ख) ॥

अर्थ

श्रीशंकरजी के हृदय में इस बात को लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गयी, परन्तु सतीजी इस भेद को नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजी के मन में [भेद खुलने का] डर था, परन्तु दर्शन के लोभ से उनके नेत्र ललचा रहे थे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य” प्रकरण का सोरठा ४८ (ख) है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य के संवाद तथा रामकथा की भूमिका का वर्णन है।

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याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य