संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति

दोहा ४५ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥ ४५ ॥

अर्थ

हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और श्रुति, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरु के साथ छिपाव करने से हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य” प्रकरण का दोहा ४५ है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य के संवाद तथा रामकथा की भूमिका का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद, प्रयाग माहात्म्य