सो सुनि रामहि भा अति सोचू
सो सुनि रामहि भा अति सोचू
चौपाई २, दोहा २२७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥ भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥ २ ॥
अर्थ
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को अत्यन्त सोच हुआ। इधर तो पिता के वचन और इधर भाई भरतजी का संकोच ! भरतजी के स्वभाव को मन में समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्त को ठहराने के लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी के अशुभ स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना और लक्ष्मणजी के क्रोध का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध