करि कुमंत्रु मन साजि समाजू

चौपाई ३, दोहा २२८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥ कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥ ३ ॥

अर्थ

अपने मन में बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्य को निष्कण्टक करने के लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों (अनेकों) प्रकार की कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी के अशुभ स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना और लक्ष्मणजी के क्रोध का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध