अनुचित नाथ न मानब मोरा
अनुचित नाथ न मानब मोरा
चौपाई ४, दोहा २२९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा॥ कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें॥ ४ ॥
अर्थ
हे नाथ ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरत ने हमारे साथ छोटा व्यवहार नहीं किया है। आखिर कहाँतक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथ में है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २२९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी के अशुभ स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना और लक्ष्मणजी के क्रोध का वर्णन है।
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सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध