सकल सनेह सिथिल रघुबर कें

चौपाई १, दोहा २२६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥ जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥ १ ॥

अर्थ

सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के मारे शिथिल होने के कारण सूर्यास्त होने तक (दिनभर में) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थल का सुवास देखकर रात को वहीं [बिना खाये-पीये ही] रह गये। रात बीतने पर श्रीरघुनाथजी के प्रेम से आगे गमन किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी के अशुभ स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना और लक्ष्मणजी के क्रोध का वर्णन है।

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सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध