बिषई जीव पाइ प्रभुताई

चौपाई १, दोहा २२८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥ भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना॥ १ ॥

अर्थ

परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूप को प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणों में उनका प्रेम है, इस बात को सारा जगत् जानता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी के अशुभ स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना और लक्ष्मणजी के क्रोध का वर्णन है।

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सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध