सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू
चौपाई १, दोहा २२९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥ भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥ १ ॥
अर्थ
सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमद ने कलंक नहीं दिया? भरत ने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋण को कभी रंच भी शेष नहीं रखना चाहिए।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी के अशुभ स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना और लक्ष्मणजी के क्रोध का वर्णन है।
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सीता का स्वप्न, भरत के आगमन की सूचना, लक्ष्मण का क्रोध