मारीच प्रसंग और स्वर्ण मृग रूप में मारीच का मारा जाना

रावण की योजना में सहायता करने के लिए मारीच स्वर्ण मृग का मोहक रूप धारण करता है। श्रीराम उसके छल का अंत करते हैं, और मारीच अंतिम क्षण में प्रभु का स्मरण करता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण ११ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥ दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥ ३ ॥

अर्थ:

भगवान ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना। स्वार्थपरायण और नीच रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया।

चौपाई

नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥ ४ ॥

अर्थ:

नीच का झुकना भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। हे भवानी! दुष्ट की प्रिय वाणी भी [उसी प्रकार] भयदायक होती है, जैसे अकाल के फूल !।

दोहा

करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥ २४ ॥

अर्थ:

तब मारीच ने उसको पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी--हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं ?।

दोहा 25 के अंतर्गत
चौपाई

दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥ होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥ १ ॥

अर्थ:

अभागे दशमुख ने उसके सामने सारी कथा कही और फिर अभिमान सहित कहा--छल करनेवाले कपट-मृग बनो, जिस विधि से मैं राजवधू को हर लाऊँ।

चौपाई

तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥ तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥ २ ॥

अर्थ:

तब उसने (मारीचने) कहा--हे दशशीश! सुनिये। वे मनुष्यरूप में चराचर के ईश्वर हैं। हे तात! उनसे बैर न कीजिये। उन्हीं के मारने से मरना और उनके जिलाने से जीना होता है।

चौपाई

मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥ सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

यही राजकुमार मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये गये थे। उस समय श्रीरघुनाथजी ने बिना फल का बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षण भर में सौ योजन पर आ गिरा। उनसे बैर करने में भलाई नहीं है।

चौपाई

भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई॥ जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा॥ ४ ॥

अर्थ:

मेरी दशा तो कीट-भृंग की-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को ही देखता हूँ। और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करने में पूरा न पड़ेगा (सफलता नहीं मिलेगी)।

दोहा

जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड। खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड॥ २५ ॥

अर्थ:

जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है ?।

दोहा 26 के अंतर्गत
चौपाई

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी॥ गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा॥ १ ॥

अर्थ:

अतः अपने कुल की कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियाँ दीं (दुर्वचन कहे)। [कहा--] अरे मूर्ख ! तू गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है ?।

चौपाई

तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥ सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी॥ २ ॥

अर्थ:

तब मारीच ने हृदय में अनुमान किया कि शस्त्री (शस्त्रधारी), मर्मी (भेद जाननेवाला), प्रभु, सठ, धनी, वैद, बंदी, कवि और भानस गुनी--इन नौ व्यक्तियों से विरोध करने में कल्याण (कुशल) नहीं होता।

चौपाई

उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥ उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें॥ ३ ॥

अर्थ:

जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण तकी (अर्थात्‌ उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा)। [सोचा कि] उत्तर देते ही (नाहीं करते ही) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजी के बाण लगने से ही क्यों न मरूँ ?।

चौपाई

अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥ मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही॥ ४ ॥

अर्थ:

हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला। श्रीरामजी के चरणों में उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम सनेही श्रीरामजी को देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावण को नहीं जनाया।

छन्द

निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥ निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥

अर्थ:

[वह मन-ही-मन सोचने लगा] अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों की सफलता करके सुख पाऊँगा। जानकीजी सहित और छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत कृपानिधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश (किसी के वश में न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान्‌) को भी वश में करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्द के समुद्र श्रीहरि अपने हाथों से बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!॥।

दोहा

मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान। फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन॥ २६ ॥

अर्थ:

धनुष-बाण धारण किये मेरे पीछे-पीछे पृथ्वी पर (पकड़ने के लिये) दौड़ते हुए प्रभु को मैं फिर-फिरकर देखूँगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।

दोहा 27 के अंतर्गत
चौपाई

तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ॥ अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥ १ ॥

अर्थ:

जब रावण उस वन के निकट पहुँचा, तब मारीच कपटमृग बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता। सोने का शरीर मणियों से जड़कर बनाया था।

चौपाई

सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा॥ सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला॥ २ ॥

अर्थ:

सीताजी ने उस परम सुन्दर हिरन को देखा, जिसके अंग-अंग की छटा अत्यन्त मनोहर थी। [वे कहने लगीं--] हे देव! हे कृपालु रघुवीर! सुनिये। इस मृग की छाल बहुत ही सुन्दर है।

चौपाई

सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही॥ तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥ ३ ॥

अर्थ:

जानकीजी ने कहा-हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब श्रीरघुनाथजी [मारीच के कपटमृग बनने का] सब कारण जानते हुए भी, देवताओं का कार्य बनाने के लिये हर्षित होकर उठे।

चौपाई

मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा॥ प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हिरन को देखकर श्रीरामजी ने कमर में फेंट बाँधा और हाथ में धनुष लेकर उस पर सुन्दर (दिव्य) बाण चढ़ाया। फिर प्रभु ने लक्ष्मणजी को समझाकर कहा-हे भाई! वन में बहुत-से राक्षस फिरते हैं।

चौपाई

सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी॥ प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी॥ ५ ॥

अर्थ:

तुम बुद्धि और विवेक के द्वारा बल और समय का विचार करके सीता की रखवाली करना। प्रभु को देखकर मृग भाग चला। श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े।

चौपाई

निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥ कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥ ६ ॥

अर्थ:

वेद जिनके विषय में “नेति-नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यान में नहीं पाते (अर्थात्‌ जो मन और वाणी से नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी माया से बने हुए मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है।

चौपाई

प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥ तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥ ७ ॥

अर्थ:

इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभु को दूर ले गया। तब श्रीरामचन्द्रजी ने तककर (निशाना साधकर) कठोर बाण मारा, [जिसके लगते ही] वह घोर शब्द करके पृथ्वी पर गिर पड़ा।

चौपाई

लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥ प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥ ८ ॥

अर्थ:

पहले लक्ष्मणजी का नाम लेकर उसने पीछे मन में श्रीरामजी का स्मरण किया। प्राण त्याग करते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया और प्रेमसहित श्रीरामजी का स्मरण किया।

चौपाई

अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना॥ ९ ॥

अर्थ:

सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामजी ने उसके हृदय के प्रेम को पहचानकर उसे वह गति (अपना परमपद) दी जो मुनियों को भी दुर्लभ है।

दोहा

बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥ २७ ॥

अर्थ:

देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएँ (स्तुतियाँ) गा रहे हैं [कि] श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुर को भी अपना पद दे दिया।