उभय भाँति देखा निज मरना
उभय भाँति देखा निज मरना
चौपाई ३, दोहा २६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥ उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें॥ ३ ॥
अर्थ
जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण तकी (अर्थात् उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा)। [सोचा कि] उत्तर देते ही (नाहीं करते ही) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजी के बाण लगने से ही क्यों न मरूँ ?।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।
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स्वर्ण मृग और मारीच वध