अस जियँ जानि दसानन संगा
अस जियँ जानि दसानन संगा
चौपाई ४, दोहा २६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥ मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही॥ ४ ॥
अर्थ
हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला। श्रीरामजी के चरणों में उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम सनेही श्रीरामजी को देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावण को नहीं जनाया।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
स्वर्ण मृग और मारीच वध