नवनि नीच कै अति दुखदाई
नवनि नीच कै अति दुखदाई
चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥ ४ ॥
अर्थ
नीच का झुकना भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। हे भवानी! दुष्ट की प्रिय वाणी भी [उसी प्रकार] भयदायक होती है, जैसे अकाल के फूल !।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।
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स्वर्ण मृग और मारीच वध